कविता - "कारगिल की कहानी"

कविता - "कारगिल की कहानी"

कविता - "कारगिल की कहानी"
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कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी 
हथेलियों पे जान रख के
पहाड़ों को रौंदने की कहानी 
कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी।
 
मक़सद तय था,रस्ता तय था 
 क़ीमत भी मालूम थी,दुश्मन  भी तयशुदा था 
लहू को जमाती 
हिम्मत बर्फानी 
कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी ।

कोई जात नहीं कोई मज़हब नहीं 
देश से बड़ा कोई रब भी नहीं 
उठा जब मारने दुश्मन को 
साथ धरती चली रुका नभ भी नहीं
डर से भागा दुश्मन 
हारी उसकी ताकत जिस्मानी 
कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी ।

जंग है, हालात भी तंग हैं 
ऊंचे पहाड़ों पर खेलते वीर सपूत 
दुश्मन भी दंग है 
जिस्म से परे, करिश्मों से भरे 
आत्मबल की कहानी 
कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी ।

ख़ून गिरा तो जम गया 
जिस्म पूरा नम्म गया 
रूह गरमाती रही 
एहसास कराती रही 
गिरा जो कभी थक कर
फ़र्ज़ की आवाज बुलाती रही 
अदम् साहस रूहानी 
कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी ।

 कोई उनको क्यों याद करे?
 वक्त अपना क्यों बर्बाद करे?
बड़ा मसरूफ जमाना है 
क्यूं कोई लिहाज करे ?
पर ज़रा सोचो 
गर इतिहास ना याद रहे 
फिर कैसे हम आबाद रहें?
क्या लोग थे वह अभिमानी,
पीर, फकीर रूहानी 
कारगिल की कहानी 
जोश की ज़ुबानी।

* रचनाकार - राजेश कुमार लंगेह  (जम्मू )