कविता - “सिंहों का सरदार”
कविता - “सिंहों का सरदार”
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वो सिंहों का सरदार था,
दुश्मन पर कहर अपार था,
जब धरती डर से काँप रही,
वह बनकर वज्र-प्रहार था।
वो सिंहों का सरदार था...
वाणी में ज्वाला भर देता,
हर दिल में अंगार जगा देता,
जात-पात की दीवारें तोड़,
इंसान को शमशेर बना देता।
पाक रूह का विचार था
वो सिंहों का सरदार था...
एक-एक, सवा लाख से भिड़ा,
हर योद्धा शेरों सा अड़ा,
साधारण जन जब रण में उतरा,
हर सैनिक सिंह बनकर लड़ा।
अज़ब किया चमत्कार था
वो सिंहों का सरदार था...
सीख दी—डर को मार गिराओ,
कायर बनकर पीठ न दिखाओ,
रण में गिरना तो हँसकर गिरना,
मरने से पहले शत्रु गिराओ
दुश्मनों में हाहाकार था
वो सिंहों का सरदार था,...
चार-चार पुत्र रण में खोए,
फिर भी न विचलित हुए
प्रहरी सा अडिग वो खड़ा रहा,
अमृत बाँटा, विष खुद ही पिए
एक एक सिंह खासदार था
वो सिंहों का सरदार था...
खालसा जब उसने गढ़ डाला,
भीड़ नहीं, था वह बल की ज्वाला,
हर एक चिंगारी अंगार बनी
जागी दिल में प्रचंड ज्वाला।
सूरज सा वो आधार था
वो सिंहों का सरदार था...
मालूम था—युद्ध कठिन है,
मुगलों से लड़ना भी कठिन है,
मौत से पहले जिंदा लाशों में,
बलबला पैदा करना भी कठिन है
मौजूदगी उसकी जीत का आसार था
वो सिंहों का सरदार था...
आज भी जब सीमा पर कोई,
अडिग खड़ा बन जाता ढाल,
उसमें उसकी छवि झलकती—
वह सेनापति, भारत का लाल
सब कुछ निछावर कर दो
पैदा अदभुत विचार था
वो सिंहों का सरदार था।
* रचनाकार -

* राजेश कुमार लंगेह (जम्मू)
