चइता : "पिया भए सपनवां"
चइता : "पिया भए सपनवां"
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(अब तो होली भी बीत गई। फागुन के बाद चैत्र मास का आरंभ हो गया।नया वर्ष।फसल पक चुकी है उसकी कटाई और मड़ाई करने वाला घर में कोई नहीं है। विरह व्यथा बढ़ती जा रही है। उसने अपना दर्द फ़ोन पर सुनाया...)
लागि गइला चइत महिनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
जिया अकुलाए मोरा,पकली फसलिया
पियराइल देहियां अउ गोहुवां क बलिया
घरी-घरी पूंछे खरिहनवां हो रामा।
*पिया भए सपनवां*
फोनवां क टोनवां करेजवा क सालइ,
बिरह क चकरी म दाल जइसे दालइ
गरमी देखावइ अब तो दिनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
महुआ के जइसन चुवइं मोरी अंखियां
फिर भी,टिपोरी बोलइं मिलि सारी सखियां
सहा नाहीं जाए हमसी तनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
मन मोरा मचले,न माने मोरी बतिया
केकरा बताई रउवा हिया कइ हलतिया
उपरा से डाहेला मदनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
रतिया में सिसकी से भीगि जाए तकिया
भगिया पे हमरे परल काहें चकिया
लुटि गइले आइके गवनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
बहरे जउ निसरी त पूंछे हमसी घुरवा
केकरा बिन मंगिया म भरे हौ सिंदुरवा
सिसकी से गूंजेला भवनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
प्रेम नगरिया क सूनी सब डगरिया
कब ले जियब,नाहीं ओनके खबरिया
भेजि देत्या हमइ बिन कफनवां हो रामा
*पिया भए सपनवां*
* रचनाकार : सुरेश मिश्र (वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक) मुंबई
