कजरी : हमके नींद न आवइ न ...

कजरी : हमके नींद न आवइ न ...

कजरी : हमके नींद न आवइ न ...
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(सावन लगते ही चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिख रही है, मगर नायिका के दिल में सूखा पड़ा है। प्रियतम परदेश में हैं। बार बार विनती करने पर भी गांव नहीं आए। वह विरह की आग में झुलस रही है। प्रकृति के सारे उपमान विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं। घर में पैसा भी नहीं है कि कुछ जतन करवा सके। उसने प्रियतम को फोन किया .....  

छन्हिया चुवइ पिया सारी रतिया
हमके नींद न आवइ न।

जब से लागल अहइ सवनवां,
काटइ दउड़त बा मधुबनवां,
धक-धक धड़कइ हमरी छतिया,
रतिया नींद न आवइ न।

बगिया में परि गइल झुलनवां,
बस में अहइ न हमरा मनवां,
रिमझिम लइके आइ संसतिया,
हमके नींद न आवइ न।

सगरी रतिया होइ कजरिया,
कांटा जइसन लगइ सेजरिया,
केकरा कही हिया कइ बतिया,
हमके नींद न आवइ न।

एक तउ हमके काम सतावइ,
दुसरे चुहचुइया डेरवावइ,
आखिर केतनी सही बिपतिया,
हमके नींद न आवइ न।

अंखियन नीर चुवइ जस ओरी,
जियरा जरइ मोर जस होरी,
तोहरी मारल बाटइ मतिया,
हमके नींद न आवइ न।

हमके होत अहइ हैरानी,
हंसि-हंसि ताकइं हमइ जेठानी,
केतनी होए मोर अगतिया,
हमके नींद न आवइ न।

ना तू हमरा फोन उठावा,
ना कवनउ संदेश पठावा,
बितिगा साल,न आइल पतिया,
हमके नींद न आवइ न।

हे बाबा बागेश्वर वाले,
हमरउ भी अर्जी लगवा ले,
हरिल्या हमरी आजु संसतिया,
हमके नींद न आवइ न।

छन्हिया चुवइ पिया सारी रतिया
हमके नींद न आवइ न।

* रचनाकार : सुरेश मिश्र (कवि एवं मंच संचालक)  - मुंबई