***गणगौर***

  ***गणगौर***

   *** गणगौर***

पति प्रेम का प्रतीक है गणगौर, चिर पुरातन और चिर नूतन है गणगौर, फागुन कृष्ण की एकम से क्षेत्र शुक्ला की तृतीय तक होती है गणगौर पूजा,  माता जानकी ने भी मनचाहा वर पाने किया था गौरी पूजन, मां पार्वती ने की घोर तपस्या शिवजी  को वर रूप पाने  की खातिर, शिवजी ने प्रसन्न होकर मां पार्वती से ब्याह रचाया, पत्नी को इतना स्नेह और सम्मान दिया उसे अपना आधा अंग ही बना लिया।

  राजस्थान की सूखी माटी में वसंत के आते ही उत्साह और उल्लास की धूम मच जाती हैं, कुंवारी कन्याएं 16 दिन तक बड़े मनोयोग से शिवजी को अपना जीजा मानते हुए सुंदर रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर होली के दूसरे दिन से ही करने लगती है ईसर और गोरा की पूजा, शीतला सप्तमी या अष्टमी को बड़ी गणगौर बिठाई जाती हैं, चिकनी मिट्टी से शिव (ईसरजी) पार्वती (गणगौर) कानीराम (कृष्णा) रोआं (सुभद्रा) और मालिन की मूर्तियां बनाई जाती हैं उनका श्रृंगार  किया जाता हैं।

 सुबह दोपहर रात को गीत गाए जाते हैं। वंश के फैलाव के प्रतीक दूब और फूल लाये जाते हैं, पूजा  की जाती हैं, पूजा के गीत गाए जाते हैं, (गोर  ये गणगौर माता, खोल किंवाड़ी, बायर उभी  बायां पूजण वाली), इसी तरह गणगौर के हर विधा के अनेकों गीत गाए जाते हैं जो हमारी समृद्ध लोक भाषा के प्रतीक हैं, बीकानेर और जयपुर में बड़ी धूमधाम से गणगौर का बिंदोरा निकाला जाता हैं, गणगौर तथा ईसर जी की मूर्तियां की पूजा कुंकू और काजल की 9- 9 टीकी द्वारा किया जाता हैं, दूब से पानी का छींटा दिया जाता हैं, प्रसाद चढ़ाया जाता हैं, अंत में बधावा गाया जाता हैं। महिलाएं सोलह सिंगार करती हैं, बहुत धूमधाम गणगौर पर्व मनाया जाता हैं, पति और बच्चों के लंबी उम्र का वरदान मांगा जाता हैं।

*रचनाकार : डॉ.मंजू मंगलप्रभात ‌‌लोढ़ा‌‌‍‌ - मुम्बई