गौरैया दिवस पर विशेष कविता "गौरैया"
गौरैया दिवस पर विशेष कविता "गौरैया"
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देहरी पर आकर गौरैया
लगी पूछने मुझसे,'भैया'
पेड़ों की हो गई कटाई,
कच्चे घर की हुई विदाई,
पहले-सा दालान नहीं अब,
झुरमुट या खलिहान नहीं अब,
मानव के ऐसे हथकंडे,
खा जाएं मेरे ही अंडे,
नाग घूमते चारों ओरी,
कहां रहूं मैं चोरी-चोरी,
खूब प्रगति के दीप जलाएं,
मंगल ग्रह पर नीर बहाएं,
पर छोटी-सी बात बताएं,
*हम अपना घर कहां बनाएं ?*
मेरे छोटे-छोटे बच्चे,
प्यारे-प्यारे दिल के सच्चे,
मैं भी मां का फर्ज निभाने,
कहीं गई थी चारा लाने,
चूं-चूं, चूं-चूं बच्चे गाते,
भूख लगी पर वक्त बिताते,
कुटिल सांप ने आंख तरेरे,
निगल गया बच्चों को मेरे,
फटा कलेजा किसे दिखाएं,
किसको दिल का दर्द बताएं,
अब छोटी-सी बात बताएं,
*हम अपना घर कहां बनाएं ?*
दर्द बेचारी सहते-सहते,
व्यथा हृदय की कहते-कहते,
सिसक पड़ी वह रोते-रोते,
गौरैया के आंसू बहते,
देहरी लगी सिसककर रोने,
लगा झरोखा आपा खोने,
धरती भीग गई थी सारी,
चली हृदय पर आज कटारी,
मैं सोचा उसको समझाऊं,
पेड़ कटे क्यों,उसे बताऊं,
लेकिन इतना कहकर दइया,
लुढ़क गई छोटी गौरैया,
तन उसका निष्प्राण पड़ा था,
अब भी उसका प्रश्न खड़ा था,
प्रगति करें,जीभर इतराएं,
अंतरिक्ष में भवन बनाएं,
लेकिन इतनी बात बताएं,
*हम अपना घर कहां बनाएं ?*
* रचनाकार : सुरेश मिश्र (वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक)-मुम्बई
