कविता : सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते

कविता : सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते
* राजेश कुमार लंगेह

कविता : सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते
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सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते ...
सवालों से फ़िर सवाल निकलते हैं 
यकीन से चलती है यह दुनिया, यह रिश्ते ,
पर  अफ़सोस भरोसे बाज़ार में नहीं मिलते हैं
सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते ...।
हिसाब हो सही कर लें 
जमा कर लें या घटा लें 
कम हो तो गुणा कर लें 
हो ज्यादा तो भाग कर लें 
शक़ है की कोई हद्द नहीं इसकी 
वो यकीन कहां से लाएं 
जिसपे यक़ीन कर लें 
यक़ीन  के फूल यूंही नहीं खिलते 
सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते ....।
यहां यक़ीन है वहां सवाल नहीं 
हो ज़िद्द मनचाहे जवाब की 
तो उस रिश्ते में जमाल नहीं 
आंखें कान सब झूठे हैं 
उनपे यकीन हो जाए तो कोई कमाल नहीं 
रूह है तेरी जो तराज़ू है 
इक तरफ़ तेरा यक़ीन 
सबूत इक बाजू है 
रूह से तो बस रस्ते मिलते हैं 
सवालों से सिर्फ़ जवाब नहीं मिलते
सवालों से फ़िर सवाल निकलते हैं।

* रचनाकार : राजेश कुमार लंगेह  (जम्मू )