अवधी कविता - "हमहूं भइल हौं पकल आम,  रोज तोरी रहिया निहारी" 

अवधी कविता - "हमहूं भइल हौं पकल आम,  रोज तोरी रहिया निहारी" 

अवधी कविता - "हमहूं भइल हौं पकल आम,
 रोज तोरी रहिया निहारी" 

---------------------

(बूढ़ी मां गांव में अकेली है। प्रियतम का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाया था। अचानक हार्ट अटैक आया और चल बसे।एक ही बेटा था। मेहनत मजदूरी करके पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और धूमधाम से उसकी शादी करवाई। बेटा परदेस गया तो अपनी बीबी को भी बुला लिया। कर्ज लेकर फ्लैट -कार ले लिया मगर मां के दूध का कर्ज भूल गया। बूढ़ी मां अब पचासी साल की हो गई है,वह रास्ता जोह रही है कि बेटा एक दिन आएगा। उसने चैत्र के महीने में संदेश भेजा )...

पाकल फसलिया लल्ला,
पाकि गइ जिनिगिया ,
रोज तोरी रहिया निहारी 
हमहूं भइल हौं पकल आम 
*रोज तोरी रहिया निहारी* ।

नाहीं भरोसा कवनउ,उड़ि जइहैं चिरई हो
काम न करिहइं भइया,अब कवनउ बिरई हो
केतना दिना तक ढोइब,जर-जर शरिरिया
रोज तोरी रहिया निहारी 
एकरा न अब बा केउ निजाम 
*रोज तोरी रहिया निहारी* ।

तोहरा क पललीं-पोसली,तहरा पढ़उले हो
अंगुरी पकड़ि के दउड़इ,हमहीं सिखउले हो
पउले बुढ़ाई बेरी,खाली बखरिया 
रोज तोरी रहिया निहारी 
केकरा क बनि गइल्या गुलाम? 
*रोज तोरी रहिया निहारी* ।

दुधवा क कर्जा बाबू,गजबइ चुकइल्या हो 
कर्जा से बंग्ला गाड़ी,सब कुछ बनइल्या हो
माई भुलाइल तोहके,भाइल मेहरिया 
रोज तोरी रहिया निहारी 
कलझी इहां हम सुबहोशाम 
*रोज तोरी रहिया निहारी* ।

एक बेरी आके मुन्ना,मुहवां दिखा जा हो 
तोहरा क देखइ खातिर,जियरा टंगल बा हो 
यमदूत घेरे हउवें,करी कबले ररिया 
रोज तोरी रहिया निहारी 
हमरा क लइ चल काशी धाम 
*रोज तोरी रहिया निहारी* ।

गिनती क संसिया बाटइ,कइसे बताई हो
तोहरा क देखइ खातिर,आवइ रोवाई हो
कवने घरी टुटि जाई संसिया डोरिया 
रोज तोरी रहिया निहारी 
कवने पहर होइ जाई शाम 
*रोज तोरी रहिया निहारी* ।

* रचनाकार : सुरेश मिश्र (वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक) मुम्बई