अवधी कविता : कउड़ा जस बिरहन जरे ...
अवधी कविता : कउड़ा जस बिरहन जरे ...
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तपे लुगाई ठंड में, कटकटात हैं दांत, कोहरे में लिपटी हुई,अलसाई है रात।
अलसाई है रात, पात से टप-टप पानी,
कुचकुचवा कर रहा भंग, सगरी वीरानी ।
कह सुरेश कविराय चले सन-सन पुरवाई,
पिया बसे परदेस,विरह में तपे लुगाई ।
* रचनाकार : सुरेश मिश्र

(वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक)- मुम्बई
