कविता : फिर निकल पड़ा घर से !
कविता : फिर निकल पड़ा घर से !
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फिर निकल पड़ा घर से
खुद को कमाने
खुशियां लाने
भारी बोझ रस्ते अनजाने
फिर निकल पड़ा घर से
खुद को कमाने ।
जब भी घर आता हूँ
नये सपनों की बारात होती है
हर बार बोझ बड़ा लेता हूँ पर सपने फिर भी अधूरे छूट जाते है
आज फिर निकला हूँ बोझा बढ़ाने
खुशियां लाने
फिर निकल पड़ा घर से
खुद को कमाने
खुशियां लाने।
रोज़ लगता हूँ बाज़ार सा, उछलता फिसलता हूँ
रोज़ सजाता हूँ चमकाता हूँ
ख़ुद को फिर कहीं बिकता हूँ
फिर बैठा हूँ किसी दुकान पर रिझाने
फिर निकल पड़ा घर से
खुद को कमाने
खुशियां लाने।
* रचनाकार : राजेश कुमार लंगेह (जम्मू)
