कविता -"मलेरिया दिवस"

कविता -"मलेरिया दिवस"

कविता -"मलेरिया दिवस"

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चलो चलकर ज़रा फूलों की बगिया को सजाते हैं।
जहां हो कीट,मच्छर संग कृमियों को भगाते हैं।
कहीं ना हो कोई व्याधि कहीं ना फैले मलेरिया।
चलो चलकर सभी साथी मलेरिया डे मनाते हैं।।

गली कस्बा शहर के हर डगर पर ध्यान देना है।
कोई अनजान या अल्पज्ञ उसको ज्ञान देना है।
रहें कैसे सुरक्षित स्वस्थ हवामान हो कैसा,
सभी पूरक बनें अभियान का सम्मान देना है।।

कहीं जो फेंकिए कचरा न हों कुछ व्यर्थ की चीजें।
कहीं ना चूक हो जाएं कि जाएं अर्थ की चीजें।
जरा सी भूल महंगी पड़ न जाए सोचना होगा,
बढ़ेंगी व्याधियां घर में जो रखा गर्त की चीजें।।

परिसर में कहीं न हो संचित चुल्लू भर पानी।
निरर्थक वस्तुएं न हों कहीं कोने पर अंजानी।
ऐसे ही जगह पर देते अंडे - लार्वा मच्छर,
ज़रा सा भूल बनता शूल चिंतन करना हे ज्ञानी।।

कीट एडिज जो काटे तो डेंगू द्वारी होता है।
मच्छर एनाफिलीज काटे मलेरिया जारी होता है।
घरेलू मच्छर है क्यूलेक्स होता वायरल वेस्ट नाइल,
सभी किटों से रक्षित जब दीप होशियारी होता है।।

जरा सा ध्यान दोगे यदि सुरक्षित ए जहां होगा।
न होंगी व्याधियां घर में सुगंधित बागवां होगा।
परिसर स्वच्छ होगा क्लेश बन ना आएगी मच्छर,
हमेशा स्वस्थ बालक और बूढ़ा नवजवां होगा।।

* रचनाकार : विनय शर्मा 'दीप'

  ( वरिष्ठ कवि )-(मुंबई)