कविता : कउड़ा फिर जलने लगे

कविता : कउड़ा फिर जलने लगे

कविता : कउड़ा फिर जलने लगे
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कउड़ा फिर जलने लगे सइयां सुबहोशाम,
काम करे यूं घात हिय,मन नहिं लागत काम ।


मन नहिं लागत काम,चले सन-सन पुरवाई 
पिया बसे परदेस, दुखी दिन रात लुगाई ।


कह सुरेश कविराय जिया पर चले हथउड़ा,
जरे सेज पर हिया, द्वार पर जरते कउड़ा ।

* रचनाकार : सुरेश मिश्र ( वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक ) - मुम्बई