कविता: हाँ, मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ
कविता : हाँ, मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ....
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हाँ, मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ...
क्योंकि मुझे अपनी संस्कृति से प्यार है।
सुबह की पहली किरण के साथ ही ईश्वर के दर्शन कर लेती हूँ,
उनके चरणों में नतमस्तक होकर श्रद्धा के फूल चढ़ाती हूँ,
और अपना दिन सँवार लेती हूँ।
हाँ, मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ—
माता-पिता, सास-ससुर की तस्वीर के आगे शीश झुकाकर
उनका आशीष माँग लेती हूँ।
ये मेरे संस्कारों की महक है,
मेरे घर की पहचान है।
बड़ों से ऊँची आवाज़ में बोलना अच्छा नहीं लगता,
उनसे बहस करना मेरा स्वभाव नहीं।
ध्यान और धैर्य से उनकी बातें सुनती हूँ,
और यदि कोई बात अच्छी नहीं लगे तो बाद में बड़े
स्नेह से समझा देती हूँ—
क्योंकि रिश्तों में तकरार नहीं, मधुरता को स्थान देती हूँ।
किसी भी नशे की गुलाम नहीं हूँ,
न शराब को आधुनिकता की पहचान मानती हूँ।
मेरे लिए आधुनिक बनने का अर्थ
चरित्र, विचार और व्यवहार में निखार है—
शराब के पैमाने पर नहीं।
बेटा-बेटी मेरे लिए समान हैं,
पर देर रात तक उनका अकेले बाहर घूमना
मुझे आज भी नहीं सुहाता।
हाँ, मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ।
शिक्षा की पक्षधर हूँ,
पर साथ में संस्कारों की पाठशाला भी ज़रूरी मानती हूँ।
आधुनिकता के नाम पर फूहड़पन
मेरे मन को नहीं भाता।
मेरे लिए आधुनिकता हैं
व्यवहार में विनम्रता,
दूसरों को सम्मान देना,
अपनी संस्कृति को संजोना,
उदार विचारों की गर्माहट फैलाना।
लिव-इन रिलेशन संबंधों का अर्थ आज भी पूर्ण रूप से समझ नहीं पाती,
क्योंकि ज़िम्मेदारियों से भागना मेरे मन को नहीं सुहाता।
मेरे लिए शादी कोई बंधन नहीं,
बल्कि पवित्र अग्नि की साक्षी में लिए गए सात फेरे हैं,
जो जन्म-जन्मांतर तक साथ निभाने की सीख देते हैं—
इन्हीं से घर की नींव बसती है।
तनाव की छोटी लहरों पर
तलाक का तूफ़ान खड़ा कर देना—
मेरी समझ में नहीं आता।
घर तो त्याग, धैर्य और संवेदनशीलता से बनते हैं;
बच्चों का भविष्य भी
इन्हीं चार दीवारों की मजबूती पर टिकता हैं।
हाँ, कोई बड़ा कारण हो, तो बात अलग,
पर छोटी-छोटी बातों पर अलग हो जाना,
मन को अच्छा नहीं लगता।
हमारी माँ, दादियाँ, नानियाँ—
कम साधनों में भी हमसे कहीं अधिक खुश रहती थीं।
संतोष उनका आभूषण था,
सम्मान उनका स्वभाव,
और परिवार को जोड़ने की अद्भुत क्षमता
उनकी पहचान।
घर की चारदीवारी में रहकर भी अपने
धार्मिक और सामाजिक जीवन को वे पूर्णता से जी लेती थीं।
आज सब कुछ है,
फिर भी रिश्तों में अजीब-सा खालीपन,
भावनाओं में दूरी, संवाद में कड़वाहट।
क्यों न थोड़ा सामंजस्य बिठाएँ—
कुछ पुराना संभालें, कुछ नया अपनाएँ,
रिश्तों में मधुरता घोलें,
प्यार से जीवन सँवारें।
बेटियों को आकाश दें,
उनकी सहेली बनें,
उनका हाथ थामें।
पर स्त्री-पुरुष को प्रतिस्पर्धा का मैदान क्यों बनाएँ?
दोनों की अपनी-अपनी महिमा है—
न कोई कम, न कोई अधिक।
हाँ, मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ,
पर आधुनिकता से दूर नहीं।
अपना व्यक्तित्व गढ़ती करती हूं , अपना अस्तित्व सँवारती हूँ,
पर परिवार को साथ लेकर चलती हूँ।
‘मैं’ से अधिक ‘हम’ में विश्वास रखती हूँ।
संस्कार मेरी धरोहर हैं,
शालीनता मेरी पहचान,
और मुझे इस पर गर्व है।
हाँ…
मैं कुछ-कुछ पुराने ख़यालों की हूँ।
* रचनाकार : डॉ. मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा ( वरिष्ठ साहित्यकार व समाजसेवी) - मुम्बई
