संतों की रक्षा, हमारा धर्म ...
संतों की रक्षा, हमारा धर्म ....
- डॉ. मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा ( मुम्बई )
संत चले गए, हम मौन रहे,
धूप में जलती एक छांव रहे।
था वो साधु कोई आम नहीं,
वो तो मानव में विष्णु का नाम रहे।
कपाली की घटना दुखदाई थी,
दुर्घटना या कोई साजिश छुपाई थी?
यह प्रश्न नहीं बस भाव जगा है,
क्या हमने अपना धर्म निभाया है?
जो तप से तन, जो त्याग से जीवन,
जो चुपचाप दिखाए हमें सच्चा साधन।
उन संतों की छाया में शांति बसती,
उनके आशीर्वाद से आत्मा हर्षित हँसती।
वे चलते हैं नंगे पाँव तपस्या में,
हम सोते हैं चैन से हर रात्रि में।
क्या उनका रक्षक बनना हमारा धर्म नहीं?
क्या उनका संबल बनना जैन कर्म नहीं?
वे इंद्रधनुष हैं अध्यात्म के नभ में,
प्रीति की वीणा हैं, शांति के रथ में।
उनके दर्शन से पाप भी जल जाते,
सच्चाई के दीपक जगमगाते।
संस्कृति जहाँ संत बसते हैं बनती है,
धरती पर स्वर्ग की खुशबू सी लगती है।
तो अब उठो समाज के जागो प्रहरी बनो,
संतों की रक्षा में धर्मध्वजा थाम लो।
आज प्रण करें हम सभी एक साथ,
उनकी सुरक्षा में न रहे कमी
साधु हमारे आत्मा का प्रकाश हैं,
उनकी रक्षा में ही मोक्ष का रास्ता खास है।
*****************
