नवरात्रि पर विशेष अवधी रचना "रहिया जोहत बानी न"
नवरात्रि पर विशेष अवधी रचना "रहिया जोहत बानी न"
******************
शेरवा पे चढ़िके फिनि से
आवा हे महतरिया
रहिया जोहत बानी न।
लखि-लखि थकि गइ मोर नजरिया
*रहिया जोहत बानी न।*
भक्तन कइ भिड़िया देखा,
माई चहुंओर हो,
जय अंबे का जयकारा,
पग-पग पे शोर हो,
तोहरे दर आइल बानी,
लइके लाल चुनरिया,
*रहिया जोहत बानी न।*
जल्दी आवा आजु मयरिया
*रहिया जोहत बानी न।*
महिषासुर के वंशजवा,
धोखा दें छलि-छलि के ,
गरबा मा नाचत हउवें,
भेषवा के बदलि-बदलि के
जब ले *कल्कि* न आवइं,
भांजा आइ कटरिया ,
*रहिया जोहत बानी न।*
नाही होइ जाई फिनि ररिया
*रहिया जोहत बानी न।*
धुपवा-दिपवा से महकइ,
तोहरा दरबार हो ,
अपने भक्तन के बनिजा,
फिनि तारनहार हो ,
हरि लेतू दुनिया भर से,
तू सगरी अन्हियरिया ,
*रहिया जोहत बानी न।*
फइले कब जग में उजियरिया
*रहिया जोहत बानी न।*
मंदिर मा घंटा बाजइ,
गूंजत हौ आरती,
तोहरा बोलावत हउवें,
माई मां भारती ,
षड्यंत्र फाने बाएन,
सगरे भ्रष्टाचरिया ,
*रहिया जोहत बानी न।*
जेकरे काटे नाहिं लहरिया
*रहिया जोहत बानी न।*
हे अंबे मइया हमरी,
मनसा पुरावा हो ,
जल्दी से आवा, नाहीं,
देरिया लगावा हो,
नाहीं कुछु होइ ना जाई,
लागे हमके डरिया,
*रहिया जोहत बानी न।*
शेरवा कइ अब करा सवरिया
*रहिया जोहत बानी न।*
* रचनाकार-सुरेश मिश्र

( वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक ) - मुंबई
